Thursday, November 26, 2009

अब तो वो सूखे पत्ते भी नहीं हैं, निशान हरियाली के क्यों पोंछ देता है कोई

पुल संवाद नही चाहता, कहता है, चलो निकल जाओ पार
में इसीलिए हूँ, जो आये, उधर जाये लेकर मेरा आधार

Wednesday, November 25, 2009

एक ही समय, कई रंगों वाली रोशनी होती है, चलती है, साथ हमारे
एक ही समय, देखते हैं हमें, सूरज, धरती, चाँद सितारे
तस्वीर में दिखाई कोई भी दे, कुछ भी हो आकार, आकृति
तस्वीर सचमुच हर बार, होती तो है, उजाले की ही

Tuesday, November 24, 2009

जो थोड़े से पत्ते रह गए शेष, उनके पास भी आ गया बुलावा
शाखाओं का पत्तों से जो रिश्ता है, क्या वो है एक छलावा

पत्तों में जो हरा रंग है, वह मुस्कुराता है
या इस रंग से होकर जीवन सुनाता है वह
जिससे जीवन की यह रंग बदलती अनवरत गाथा है

Monday, November 23, 2009

जाने से पहले, पत्तों ने रंग बदलते हुए, दिखा दिया अपना संपूर्ण सौंदर्य
ललक है सृष्टि के कण कण में, मिल जुल कर पूरे दृश्य को, ओर सुंदर, ओर समन्वित बनायें


ओ अनंत, तुम हर क्षण अनंत चित्र बनाते मिटाते हो
अपनी महिमा का सौन्दर्य यूँ ही दिखाते छुपाते हो

Sunday, November 22, 2009

बरसात में भीगती कार, छम छम बूंदों की झंकार,
दूर कहीं बजता सुन्दरता का मद्धम सितार
सड़क के उस छोर पर सूरज का घर है,
इससे पहले कि वो घर बदल ले अपना,
चलें अपना घर छोड़ कर उसकी तरफ़

Saturday, November 21, 2009

चलते चलते तय होती है दूरी, बदलता है रास्ता
पर कई बार लगता यूँ है कि वैसा का वैसा है सब कुछ
छोटी छोटी बूँदें भी छुपा सकती हैं पूरा दृश्य, याद रहे, किसी को छोटा मत समझ लेना

Friday, November 20, 2009

हरियाली की चौखट से होकर, जो लम्बी सड़क आती है, क्या वह भी हरियाली होती है हमेशा
कई जगहों पर शहर बड़ा उदासीन लगता है, जैसे उसे कोई परवाह ही नहीं
आप रुकें तो रुकें, चलें तो चलें