Wednesday, December 9, 2009

करते हुए पत्तों की प्रतीक्षा, गगन की आरती करती हैं
शाखाएं जड़ों का संदेश लेकर जो है, उसी से संवरती हैं


माल्यार्पण जब जब हुआ उजाले का, अंधेरे ने भी पा लिया सम्मान
कौन किससे कैसे जुड़ा हुआ है, देख देख कर हो जाते हैं हम हैरान

Tuesday, December 8, 2009

उस क्षण जब झर रहे थे पीले पीले पत्ते, बिछोह की सुन्दरता को गाते हुए
क्या सिखा रहे थे हमें कुछ, अपना उदाहरण अनायास इस तरह बताते हुए
रास्ता जाने न जाने, पहचान देती है उसे, उपस्थिति वृक्षों की, पत्तों की, हरियाली की
मौसम के साथ जो सम्बन्ध है रास्ते का, उससे जुड़ी है आत्मा होली और दीवाली की

Monday, December 7, 2009


देखो तो विस्मित करता है अपने सौंदर्य और सम्भावना से हर एक पत्थर
सुनो तो कण कण में सुनाई दे जाए शाश्वातानंद राग का पूर्ण करता स्वर
शहर की बाँहों के सकारात्मक आलिंगन में अलग अलग हम सब एक हो जाते हैं
कहीं एक स्वर्णिम शिखर को देखते, अपनी स्वप्निल पगडण्डी पर बढ़ते जाते हैं

Sunday, December 6, 2009

अखबार में जो भी है, अस्थिर है, चलायमान है
पर लीलारस की हर बात पर उसका ध्यान है

एकाग्रता उनकी पिघल कर बहती है ऐसे, की सुनने वाले भी हो जाते तन्मय
ध्यान लगा कर साथ सुरों के लेते हैं वो, रसिक शिरोमणि नंदलाल का आश्रय

Saturday, December 5, 2009

ले लेने नित्य अभय प्रदायक श्री चरणों का आश्रय
आतुर है गुरु अभिनन्दन करने को समर्पित ह्रदय



शुद्ध करने अपना मन, करवाते है हम बाबा को स्नान
करते हुए उनका गुणगान, हर मुश्किल हो जाती आसान

Friday, December 4, 2009

ऊँचे कद के पेड़, अपनी मौन महिमा में हमें नहलाते हैं
आसमान का परिचय पत्र हमारे ह्रदय तक पहुंचाते हैं


पावनता का नया परिचय सुनाता है
अग्नि सौंदर्य मुझमें गुनगुनाता है

Thursday, December 3, 2009

चित्र गतिमान सत्य का, अलग अलग रंगों में दिख कर अभी अनदिखा रह जाता है
या फिर सत्य, हर दृश्य को छूकर, उसमें होते हुए भी उससे आगे निकल जाता है

कभी कभी अच्छा लगता है रास्ते का बुलावा
और ऊँचे पेड़ों का मौन में भीगा हुआ पहनावा