Monday, December 7, 2009


देखो तो विस्मित करता है अपने सौंदर्य और सम्भावना से हर एक पत्थर
सुनो तो कण कण में सुनाई दे जाए शाश्वातानंद राग का पूर्ण करता स्वर
शहर की बाँहों के सकारात्मक आलिंगन में अलग अलग हम सब एक हो जाते हैं
कहीं एक स्वर्णिम शिखर को देखते, अपनी स्वप्निल पगडण्डी पर बढ़ते जाते हैं

Sunday, December 6, 2009

अखबार में जो भी है, अस्थिर है, चलायमान है
पर लीलारस की हर बात पर उसका ध्यान है

एकाग्रता उनकी पिघल कर बहती है ऐसे, की सुनने वाले भी हो जाते तन्मय
ध्यान लगा कर साथ सुरों के लेते हैं वो, रसिक शिरोमणि नंदलाल का आश्रय

Saturday, December 5, 2009

ले लेने नित्य अभय प्रदायक श्री चरणों का आश्रय
आतुर है गुरु अभिनन्दन करने को समर्पित ह्रदय



शुद्ध करने अपना मन, करवाते है हम बाबा को स्नान
करते हुए उनका गुणगान, हर मुश्किल हो जाती आसान

Friday, December 4, 2009

ऊँचे कद के पेड़, अपनी मौन महिमा में हमें नहलाते हैं
आसमान का परिचय पत्र हमारे ह्रदय तक पहुंचाते हैं


पावनता का नया परिचय सुनाता है
अग्नि सौंदर्य मुझमें गुनगुनाता है

Thursday, December 3, 2009

चित्र गतिमान सत्य का, अलग अलग रंगों में दिख कर अभी अनदिखा रह जाता है
या फिर सत्य, हर दृश्य को छूकर, उसमें होते हुए भी उससे आगे निकल जाता है

कभी कभी अच्छा लगता है रास्ते का बुलावा
और ऊँचे पेड़ों का मौन में भीगा हुआ पहनावा

Saturday, November 28, 2009

सीमा से परे के स्वरुप का परिचय करवा कर असीम प्यार लुटाया
स्वामी विवेकानंद ने विराट के स्वर से जन जन को जाग्रत करवाया

युग युग से अनंत के स्वरुप, मानव मन को छू जाते
इस तरह वो हमें अपनाते या शायद हम उन्हें अपनाते

Friday, November 27, 2009


साया उजाले के साथ हमारे सम्बन्ध का गतिमान परिचय धरती तक पहुंचाता जाता है
या कुछ ऐसा है की हमारे सम्मान में उजाला थोड़ी जगह छोड़ कर धरती तक जाता है
परछाई कभी कभी सच से ज्यादा सुंदर लगती है
और अपनी सुन्दरता से हमें यहाँ वहां ठगती है